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भरे खुशियों के रंग जीवन में!

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माँ का प्यार

Posted On: 18 May, 2014 Others में

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images (1)माँ शब्द सबसे सुन्दर शब्द है, इस शब्द में भावनाओं के कई इन्द्रधनुषी रंग हैं| माँ का प्यार ही जीवन का पहला प्यार होता है जो बिना किसी शर्त के आजीवन मिलता है| प्यार महसूस करने और फिर उसे जताने के सारे तरीके हर बच्चा अपनी माँ से ही सीखता है| आम तौर पर प्यार का नाम लेने पर प्रेमी-प्रेमिका की तस्वीर ही मन में उभरती है ऐसा ज्यादातर लोग अनजाने में समझते हैं मगर सच तो ये है कि प्यार का सबसे सुन्दरतम रूप माँ का प्यार है| सच्चाई ये है कि बिना किसी शर्त के प्यार करना और प्यार के सभी रूपों को पहचानना हर बच्चा अपनी माँ से ही सीखता है| माँ की संगति में महज आठ साल की उम्र में ही हर बच्चे के अन्दर एक लव मैप विकसित हो जाता है| उसी के आधार पर बच्चे की पसंद-नापसंद निर्भर करती है जैसे कि कुछ खास रंग, बातें, लोग, आवाज एवं वक्तित्व भी| हमारे जीवन में उसके प्यार के फूलों की खुशबू हर तरह के एहसासों से मन को हमेशा भिगोये रखती है|
पिता का प्यार बच्चा दुनिया में आने के बाद महसूस करता है पर माँ का प्यार वो दुनियां में आने से पहले से ही महसूस करने लगता है| ऐसा सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि पशु पक्षी और जानवरों के साथ भी है| इसका कारण बच्चे का माँ के गर्भ में नौ महीने का समय है, इस दौरान उससे माँ के खाने, खून, सांसों, हार्मोन, गुस्सा, भावनाओं और आनंद आदि सभी बातों का साझा होना है| पूरे समय का साथ दोनों को आत्मीयता और प्यार के अटूट डोर में बांध देती है| ये प्यार हर बच्चे के लिए ईश्वरीय उपहार है, वहीँ पिता के प्यार से बच्चे को प्यार की कीमत पता चलती है और सुरक्षा की भावना दोनों के प्यार से महसूस करता है| माँ से प्यार करने पर उसे ऐसा महसूस होता है जैसे वो खुद से प्यार करता हो| पाषण युग में माँओं की भूमिका दोहरी होती थी, वो घर की जिम्मेदारी सँभालने के साथ ही पुरुषों के साथ शिकार पर भी जाती थी तब वह अपने बच्चे को पीठ पर बांधे रहती थी| रानी लक्ष्मी बाई जैसी वीरांगना माँ को कौन भूल सकता है जिसने बेटे को पीठ पर बांधे अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे| आज की कामकाजी महिलाएं भी दोहरी जम्मेदारी निभाती हैं| एक माँ वक्त पड़ने पर बच्चे को अकेले ही पाल लेती है उन्हें सुसंस्कृत, शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाती हैं|
माँ और बच्चे के बीच भावनात्मक रिश्ते की मजबूती की एक वजह औक्सिटोसीन नामक हार्मोन होता है जो बच्चे के जन्म के बाद माँ के अन्दर पैदा होता है| इसी हार्मोन के कारण माँ के अन्दर बच्चे को चिपकाने और बांहों में लेने की इच्छा होती है| बच्चे को सच्चे प्यार की अनुभूति असल में माँ के प्यार से ही होती है इसलिए हर बच्चा प्यार का ककहरा अपनी माँ से ही सीखता है| अपने हर कार्य को वो सबसे पहले माँ को ही दिखाता है| अक्सर बेटियां अपनी माँ का ही प्रतिरूप होती हैं| उनमे स्नेहिल व्यवहार और संबल के सही संतुलन का गुण माँ से ही मिलता है| अक्सर एक चंचल, अल्हड लड़की माँ बनते ही सुन्दर, सहज और कोमल स्वभाव वाली बन जाती है| बेटियां शुरू से ही बच्चों से बहुत प्यार करती हैं पर बेटे अक्सर जब वो खुद पिता बनते हैं तब बच्चों से ज्यादा प्यार करते हैं| हम सबके भीतर ईश्वरीय भक्ति सा माँ का प्यार हर पल महसूस होने वाला प्यार है, संसार के सभी प्यार और प्यारे रिश्ते की नींव माँ का प्यार ही है|
- सुधा जयसवाल

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chaatak के द्वारा
May 21, 2014

उत्तम विचार, उत्तम अभिव्यक्ति ! माँ के बारे में और कुछ नहीं कहूँगा !!!

    sudhajaiswal के द्वारा
    May 25, 2014

    आदरणीय कृष्ण जी, आपको आलेख पसंद आया, बहुत ख़ुशी हुई| उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!

Madan Mohan saxena के द्वारा
May 20, 2014

सुन्दर सार्थक और भाबमय रचना , आपकी लेखनी को नमन कभी इधर भी पधारें आभार मदन

    sudhajaiswal के द्वारा
    May 20, 2014

    मदन जी लेख को पसंद करने और सराहना के लिए धन्यवाद, समय मिलते ही आऊँगी आपके ब्लॉग पर|

May 18, 2014

बहुत सुन्दर लिखा है सुधा जी .

    sudhajaiswal के द्वारा
    May 20, 2014

    आलेख को सराहने के लिए हार्दिक धन्यवाद शालिनी जी


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