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श्री कृष्ण का स्वरूप

Posted On: 13 Aug, 2014 Others में

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हमारी भारतीय संस्कृति में पर्व-त्योहारों का विशेष महत्व है। भादो माह की अष्टमी को श्री कृष्ण का जन्मोत्सव बड़े ही हर्षोउल्लास से मनाया जाता है। हमारे नीरस जीवन में पर्व-त्योहार नई आशा और स्फूर्ति प्रदान करते हैं।
श्री कृष्ण की महिमा की व्याख्या मुझ जैसे साधारण इन्सान के वश की बात नहीं। अपने साधारण ज्ञान के आधार पर एक प्रसंग के बारे में बताना चाहती हूँ कि श्री कृष्ण के कई नाम हैं- देवकीनंदन, वासुदेव, यशोदानंदन, नंदलाल, श्याम, मनमोहन, गोपाल,कान्हा, मुरलीधर। उनसे हर उम्र के प्राणी प्रेम करते थे। इस प्रेमस्वरूप ही उनको कई नाम मिले। ज्ञान को सम्पूर्णता प्रेम ही प्रदान करता है, बिना प्रेम के ज्ञान ठीक वैसे ही है जैसे बिना सुगंध के पुष्प। श्री कृष्ण ने प्रेम को ही ज्ञान का मार्ग बताया। उनका मनोहारी रूप देखकर एक बार एक गोकुलवासी ने कहा- “कान्हा तुम्हारा स्वरूप इतना सुन्दर है कि तुम पर आँखें ठहरती ही नहीं, तुम्हें जी भर देख भी नहीं पाते।” उनके मुखमंडल पर इतना तेज था, तब श्री कृष्ण ने स्व से रूप को अलग कर दिया वही रूप श्री राधा कहलाईं। स्व में श्याम का श्याम वर्ण रह गया और उजले आभा वाला वर्ण रूप यानि श्री राधा जी हैं। वो कृष्ण से अलग नहीं कृष्ण का ही रूप हैं जिसमें स्व यानि अभिमान अहंकार नहीं है और इसलिए श्री कृष्ण से पहले श्री राधा जी का नाम लिया जाता है।
कृष्ण-लीला में वात्सल्य, श्रृंगार और गीता के ज्ञान सबका समावेश है। मेरी रचनाओं के रूप में श्रद्धा-सुमन श्री कृष्ण को अर्पित हैं।

तांका

जाके सर पे
मोर मुकुट सोहे
जाके तन पे
पीला पीताम्बर है
मुख नीलाम्बर है

नख पे धरे
गोवर्धन पर्वत
उबार लिया
भक्तों को संकट से
वो कृष्ण-कन्हैया है

भजन

सांवला सलोना तेरा रूप ओ कान्हा
मैंने भी अपने मन मंदिर में बसाया

मैं अज्ञानी जान ना पाई तेरी माया
किसी ने भी तो ना भेद तेरा पाया
देव तपस्वी ऋषि सबने तेरा ध्यान लगाया
बिन तेरे सहारे इस भव सागर से
पार किसी ने ना पाया

यूँ छुप-छुप ना तरसाओ ओ छलिया
देखी जो स्वप्नों में छवि मनोहारी
कभी तो सम्मुख आ जाओ मन बसिया
प्रत्यक्ष दरश दिखा जाओ ओ कान्हा

राधा की मानी गोपियों की मानी
और मीरा की भी मानी
क्यूँ बस मेरी ही ना मानी
मैं भी तो हूँ तेरी दरश दीवानी
अपनी प्रेम-सुधा मुझ पर भी तो बरसाओ ओ कान्हा

सांवला सलोना तेरा रूप ओ कान्हा
मैंने भी तो अपने मन मंदिर में बसाया
- सुधा जयसवाल

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
August 20, 2014

सुधा जी कृष्ण नाम ही है भक्ति का पर्याय चाहे किसी रूप मैं भक्ति मैं डूब जाओ सर्वत्र कृष्ण मई ही लगता है गोपी की पुकार कृष्ण अवश्य सुनते हैं मन को और एकाग्र करो ओम  शांति शांति की अनुभूति होती जायेगी 

    sudhajaiswal के द्वारा
    October 6, 2014

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी, आपने सही कहा, रचना की सराहना के लये धन्यवाद!

sinsera के द्वारा
August 16, 2014

प्रिय सुधाजी नमस्कार, भक्ति का भाव ही ऐसा होता है की मनुष्य को किसी और ही संसार में पहुंचा देता है….जैसे की आपकी यह पुकार ..भक्ति और प्रेम का सटीक मिश्रण….अवश्य ही कान्हा तक पहुँच रही होगी..

    sudhajaiswal के द्वारा
    October 6, 2014

    आदरणीया सरिता जी, सादर अभिवादन, आपने सही कहा| ईश्वर करे कि आपकी बात सच हो मेरी पुकार कान्हा तक पहुँच जाए| आपकी प्रतिक्रिया से बेहद ख़ुशी हुई, हार्दिक धन्यवाद!

    sudhajaiswal के द्वारा
    October 6, 2014

    आदरणीय दीपक जी, प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!

Sushma Gupta के द्वारा
August 14, 2014

आपकी रचना मनको पूर्णतयाः मन्त्र-मुग्ध करने बाली है, बहुत आभार सुधा जी..

    sudhajaiswal के द्वारा
    October 6, 2014

    आदरणीया सुषमा जी, सुन्दर प्रतिक्रिया से प्रोत्साहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद!

sadguruji के द्वारा
August 13, 2014

मैं भी तो हूँ तेरी दरश दीवानी अपनी प्रेम-सुधा मुझ पर भी तो बरसाओ ओ कान्हा सांवला सलोना तेरा रूप ओ कान्हा मैंने भी तो अपने मन मंदिर में बसाया ! आदरणीय सुधा जयसवाल जी..बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना ! बहुत बहुत बधाई !

    sudhajaiswal के द्वारा
    October 6, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, रचना की सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!


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