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भरे खुशियों के रंग जीवन में!

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तू यहीं कहीं है मुझमें ही कहीं है

Posted On: 3 Oct, 2014 Others,कविता में

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असत्य पर सत्य की विजय हमें याद रहे इसलिए हर वर्ष हम बुराई रुपी रावण को जलाकर दशहरा मनाते हैं पर क्या हर वर्ष हम अपने भीतर झांक कर देखते हैं कि इस वर्ष अपनी किसी कमी या कमजोरी को दूर करेंगे। दृढ इच्छा शक्ति से हम अपने दोषों को दूर कर सकते हैं बस प्रयत्न्न करने की देर है। सत्मार्ग पर चल कर सद्गुणों का विकास ही ईश्वर की सही अर्थों में आराधना है।
कोई जोड़-घटाव नहीं कर पाई बस मन के भावों को शब्द दे दिए हैं। मेरी ये रचना कविता है भी या नहीं, पता नहीं। इसमें मेरे पापा-मम्मी, मेरी कलम की प्रेरणा, आदर्श और मार्गदर्शक ज्ञानी जी के विचार और कुछ मेरे विचार हैं।
ईश्वरीय शक्ति को मैंने जिस रूप में महसूस किया बस उसी को शब्द दिए हैं।

जब हताशा ने चारों ओर से घेरा
जीने की कोई राह नजर न आई
जिस सीरत में दिखी जीने की सूरत
उस सूरत में है तू।

झूठ की रंगीनियों ने
सूरज सा चमकाना चाहा
पर हम सच की राहों पर
दीया बनकर ही रौशन रहे
उस सच की रौशनी में है तू।

ठुकराने वाले को भी ठोकरों से बचाया
तोड़ने वाले को भी टूटने से बचाया
वो प्रेम जो सबके लिए महसूस किया
उस प्रेम में है तू।

लाख गमे-दौर आये तो क्या
अपने गम से नम न हुई आँखें
औरों के गम में छलक आये जो आंसू
उस आंसू में है तू।

मेरी खामियां बताने वाले को
अपने दिल के करीब रखा
उनकी बदौलत जो बदलाव मुझमें आया
उस बदलाव में है तू।

किसी की जीत के लिए
जब हम ख़ुशी-ख़ुशी हार गए
उस हार में जो जीत मिली
उस जीत में है तू।

जिस संगीत की स्वर-लहरी में
में हम खो जाएँ, वो धुन जो
दिल के तारों को छेड़ जाए
उस संगीत में है तू।

मासूम बच्चों की निश्छल हंसी
हर शय से खूबसूरत लगती है
उस मुसकान को देखके
मेरे होठों पर आये जो मुसकान
उस मुसकान में है तू।

जब भी किसी ने पूछा
तू क्या है? तेरा अस्तित्व क्या है?
अपने शून्य से अस्तित्व से भी किया प्यार क्योंकि
उस शून्य के साथ इकाई में है तू।

जैसे-जैसे तुझको पहचाना
खुद को पहचानते गए
खुद को पहचान कर जो पहचान मिली
उस पहचान में है तू।

मैं क्यूँ ढूंढू तुझे यहाँ-वहाँ, इधर-उधर
तू यहीं कहीं है मुझमें ही कहीं है
मेरे मन के हर खूबसूरत ज़ज्बात में है तू
मेरे हर अहसास में है तू।
- सुधा जयसवाल

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
November 24, 2014

सुधाजी बहुत ही प्यारे ज़ज़्बात हैं

    sudhajaiswal के द्वारा
    November 25, 2014

    यमुना जी, सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद!

yamunapathak के द्वारा
October 8, 2014

सुधा जी बहुत सुन्दर प्रस्तुति है. साभार

    sudhajaiswal के द्वारा
    October 9, 2014

    आदरणीया यमुना जी, प्रोत्साहन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद!

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
October 8, 2014

सुधा जी, कविता की प्रस्तावना मे आपने सही कहा है कि सही रास्ते पर चलना ही इशवर की सच्ची अराधना है । कविता मे आपने अपने भावों को कहने का अच्छा प्रयास किया है ।

    sudhajaiswal के द्वारा
    October 9, 2014

    आदरणीय बिष्ट जी, प्रयास की सराहना के लिए धन्यवाद!

jlsingh के द्वारा
October 4, 2014

मासूम बच्चों की निश्छल हंसी हर शय से खूबसूरत लगती है उस मुसकान को देखके मेरे होठों पर आये जो मुसकान उस मुसकान में है तू। तभी तो कहते हैं बच्चे में है भगवान! आपने अपनी अनुभूतियों के लिपी बद्ध किया है ..प्रेअनदयी रचना के लिए आपका अभिनंदन!

    sudhajaiswal के द्वारा
    October 4, 2014

    आदरणीय जवाहर जी, सादर अभिवादन, आपने बिलकुल सही कहा कि बच्चे भगवान् का रूप होते हैं क्योंकि उनमें छल कपट नहीं होता| हम बड़े भी अगर बच्चों जैसा निर्मल मन रख पायें और अपने दोषों को दूर करें तो ईश्वरीय शक्ति हमेशा हमारे साथ होगी| रचना को सराह कर हौसला बढाने के लिए हार्दिक धन्यवाद!


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