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भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति

Posted On: 19 Nov, 2014 Others,social issues में

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प्राचीन काल से आधुनिक काल यानि वर्तमान समय तक भारत में स्त्रियों की स्थिति परिवर्तनशील रही है| हमारा समाज प्राचीन काल से आज तक पुरुष प्रधान ही रहा है | ऐसा नहीं है कि स्त्रियों का शोषण सिर्फ पुरुष वर्ग ने ही किया, पुरुष से ज्यादा तो एक स्त्री ने दूसरी स्त्री पर या स्त्री ने खुद अपने ऊपर अत्याचार किया है| पुरुष की उदंडता, उच्छृंखलता और अहम् के कारण या स्त्री की अशिक्षा, विनम्रता और स्त्री सुलभ उदारता के कारण उसे प्रताड़ित, अपमानित और उपेक्षित होना पड़ा| पहले हम इतिहास में भारतीय स्त्रियों की स्थिति पे नजर डाल लें फिर वर्तमान स्थिति का आंकलन करेंगे|
रायबर्न के अनुसार- “स्त्रियों ने ही प्रथम सभ्यता की नींव डाली है और उन्होंने ही जंगलों में मारे-मारे भटकते हुए पुरुषों को हाथ पकड़कर अपने स्तर का जीवन प्रदान किया तथा घर में बसाया|” भारत में सैद्धान्तिक रूप से स्त्रियों को उच्च दर्जा दिया गया है, हिन्दू आदर्श के अनुसार स्त्रियाँ अर्धांगिनी कही गयीं हैं| मातृत्व का आदर भारतीय समाज की विशेषता है| संसार की ईश्वरीय शक्ति दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती आदि नारी शक्ति, धन, ज्ञान का प्रतीक मानी गयी हैं तभी तो अपने देश को हम भारत माता कहकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं|
विभिन्न युगों में स्त्रियों की स्थिति -
वैदिक युग- वैदिक युग सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से स्त्रियों की चरमोन्नती का काल था, उसकी प्रतिभा, तपस्या और विद्वता सभी विकासोन्मुख होने के साथ ही पुरुषों को परास्त करने वाली थी| उस समय स्त्रियों की स्थिति उनके आत्मविश्वास, शिक्षा, संपत्ति आदि के सम्बन्ध में पुरुषों के समान थी| यज्ञों में भी उसे सर्वाधिकार प्राप्त था| वैदिक युग में लड़कियों की गतिशीलता पर कोई रोक नहीं थी और न ही मेल मिलाप पर| उस युग में मैत्रेयी, गार्गी और अनुसूया नामक विदुषी स्त्रियाँ शास्त्रार्थ में पारंगत थीं| ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता’ उक्ति वैदिक काल के लिए सत्य उक्ति थी| महाभारत के कथनानुसार वह घर घर नहीं जिस घर में सुसंस्कृत, सुशिक्षित पत्नी न हो| गृहिणी विहीन घर जंगल के समान माना जाता था और उसे पति की तरह ही समानाधिकार प्राप्त थे| वैदिक युग भारतीय समाज का स्वर्ण युग था|
उत्तर वैदिक युग- वैदिक युग में स्त्रियों की जो स्थिति थी वह इस युग में कायम न रह सकी| उसकी शक्ति, प्रतिभा व स्वतंत्रता के विकास पर प्रतिबन्ध लगने लगे| धर्म सूत्र में बाल-विवाह का निर्देश दिया गया जिससे स्त्रियों की शिक्षा में बाधा पहुंची और उनकी स्वतंत्रता को तथाकथित ज्ञानियों ने ऐसा कहकर उनकी शक्ति को सिमित कर दिया कि- “पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने| पुत्रश्च स्थाविरे भावे, न स्त्री स्वातंत्रयमर्हति|| वो घर की चारदीवारी में कैद हो गयीं, पढने-लिखने व वेदों का ज्ञान असंभव हो गया और उनके लिए धार्मिक संस्कार में भाग लेने की मनाही हो गयी| बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन हो गया और वैदिक युग की तुलना में उत्तर व दीर्घकाल में उनकी स्थिति निम्न स्तर की होती गयी|
स्मृति युग- इस युग में स्त्रियों की स्थिति पहले से ज्यादा बदतर हो गयी, कारण यह था कि बाल-विवाह तथा बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन और बढ़ गया| इस युग में विवाह की आयु घटाकर १२-१३ वर्ष कर दी गयी| विवाह की आयु घटाने से शिक्षा न के बराबर हो गयी, उनके समस्त अधिकारों का हनन हो गया| उन्हें जो भी सम्मान इस युग में मिला वह सिर्फ माता के रूप में न कि पत्नी के रूप में| स्त्रियों का परम कर्तव्य पति जैसा भी हो उनकी सेवा करना था| विधवा के पुनर्विवाह पर भी कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया गया|
मध्यकालीन युग- इस युग में मुग़ल साम्राज्य होने से स्त्रियों की दशा और भी दयनीय हो गयी| मनीषियों ने हिन्दू धर्म की रक्षा, स्त्रियों के मातृत्व और रक्त की शुद्धता को बनाये रखने के लिए स्त्रियों के सम्बन्ध में नियमों को कठोर बना दिया| ऊँची जाति में शिक्षा समाप्त हो गयी और पर्दा प्रथा का प्रचलन हो गया| विवाह की आयु घटकर ८-९ वर्ष हो गयी| विधवाओं का पुनर्विवाह पूरी तरह समाप्त हो गया और सती-प्रथा चरम सीमा पर पहुँच गयी| इस युग में केवल स्त्रियों के संपत्ति के सम्बन्ध में सुधार हुआ उन्हें भी पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार मिलने लगा|
आधुनिक युग- आधुनिक युग में स्त्रियों की दयनीय स्थिति समाज सुधारकों तथा साहित्यकारों ने ध्यान दिया और उनकी दशा सुधारने के प्रयास किये| जहाँ कवि मैथिलीशरण गुप्त ने स्त्रियों की दशा की तरफ समाज का ध्यान आकर्षित करने के लिए मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ लिखी कि- अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी| आँचल में है दूध और आँखों में पानी||
वहीँ कवि जय शंकर प्रसाद ने स्त्रियों की महत्ता का बोध समाज को अपनी इन पंक्तियों से कराया- नारी तुम केवल श्रद्धा हो , विश्वास रजत नग, पग तल में| पियूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में||
साहित्यकारों ने स्त्री की ममता, वात्सल्य, राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने वाले गुणों के महत्व को समाज को समझाया और उनकी महत्ता के प्रति जागरूक किया|
अनेक समाज सुधारकों ने उनकी दशा सुधारने के लिए सकारात्मक प्रयास किया| स्वामी दयानंद ने स्त्री-शिक्षा पर बल दिया, बाल-विवाह के विरूद्ध आवाज उठाई| राजा राम मोहन राय ने सती-प्रथा बंद कराने के लिए संघर्ष किया| परिणामस्वरूप सन १९२९ में बाल विवाह निरोधक अधिनियम द्वारा बाल विवाह का कानूनी रूप से अंत कर दिया गया, अब कोई भी माता-पिता लड़की का विवाह १८ वर्ष की आयु से पहले नहीं कर सकता|
१९६१ के दहेज़ विरोधी अधिनियम द्वारा दहेज़ लेना व देना अपराध घोषित कर दिया गया मगर व्यावहारिक रूप से कोई विशेष सुधार नहीं हो पाया|
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्त्री की स्थिति- स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्त्री की दशा में बदलाव आया| भारतीय संविधान के अनुसार उसे पुरुष के समकक्ष अधिकार प्राप्त हुए| स्त्री शिक्षा पर बल देने के लिए स्त्रियों के लिए निःशुल्क शिक्षा एवं छात्रवृति की व्यवस्था हुई| परिणामतः जल, थल व वायु कोई भी क्षेत्र स्त्री से अछूता नहीं रहा| १९९५ के विशेष विवाह अधिनियम ने स्त्रियों को धार्मिक व अन्य सभी प्रकार के प्रतिबंधों से मुक्त होकर विवाह करने का अधिकार दिया, अब बहुपत्नी विवाह गैर कानूनी माना गया| स्त्रियों को भी विवाह विच्छेद का पूरा अधिकार मिला और विधवा विवाह भी कानूनी रूप से मान्य हुआ| पत्नी पति की दासी नहीं मित्र मानी जाने लगी|
उपर्युक्त सारी बातें इतिहास की किताबों या बीते समय की बातें हैं और वर्तमान समय में कितनी सही है और कितनी गलत ये इस बात पर निर्भर है कि हम व्यवहारिक रूप से स्त्रियों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा की महत्ता को समझें| सिर्फ क़ानून की किताबों और कानून के रक्षक के हाथों की कठपुतली ही न बनकर रह जाएँ|
वर्तमान युग- वर्तमान युग या आज के समय की बात करें तो इसमें कोई दो राय नहीं कि स्त्रियों की स्थिति पहले से अच्छी है, लगभग सभी देशों में स्त्री ने पुनः अपनी शक्ति का लोहा मनवाया है| हम कह सकते हैं कि आज का युग स्त्री-जागरण का युग है| भारत के सर्वोच्च पद [राष्ट्रपति] को भी स्त्री ने सुशोभित किया| ज्ञान, विज्ञानं, चिकित्सा, शासन कार्य और यहाँ तक कि सैनिक बनकर देश की रक्षा के लिए मोर्चों पर जाने का भी साहस करने लगी है| स्त्री अपराजिता है और उसकी जीत में पुरुषों का योगदान ठीक वैसे ही है जैसे एक पुरुष की जीत में स्त्री का हाथ होता है| उसकी स्थिति को सशक्त बनाने में पिता, भाई, पति और पुत्र का हर कदम पर साथ मिला| स्त्रियों को कानून का भी साथ मिला है मगर अभी भी पूरे देश में स्त्रियों में वो जागरूकता नहीं आई है कि वो कानून से मिले अधिकारों से अपने साथ हो रहे अत्याचार, अन्याय और प्रताड़ना के खिलाफ आवाज उठाये| ज्यादातर स्त्रियाँ अपने परिवार और समाज के खिलाफ कदम उठाने का साहस ही नहीं जुटा पातीं| आज भी स्त्रियों का एक बड़ा वर्ग अपने कानूनी अधिकारों से भी अनभिज्ञ है और जो वर्ग आवाज उठाने की हिम्मत करता है उन्हें भी बहरे और अंधे कानून से उचित न्याय नहीं मिल पाता|
सबसे बड़ा सवाल उसके आत्मसम्मान की सुरक्षा का है, आज भी स्त्री हर जगह असुरक्षित है| जिस पुरुष ने अपनी माँ, बहन, बेटी और पत्नी को आत्मनिर्भर बनने में साथ दिया क्या वो उसे समाज में सम्मान से जीने का भरोसा दे पाया? सुबह घर से काम पर निकलने वाली स्त्रियाँ शाम को सुरक्षित घर कैसे लौटें, सबको ये डर सताता रहता है| क्या कानून, पुलिस और हमारा समाज अपनी जिम्मेदारी निभा पाया? क्या ऐसे समाज को हम अच्छा कहेंगे जहाँ स्त्री को अपनी इज्जत की भीख मंगनी पड़े? क्या रिश्तेदारों का साथ होना सुरक्षा की गारंटी दे सकता है? क्या पुरुष पश्चमी सभ्यता नहीं अपनाते? क्या आजादी सिर्फ पुरुषों को मिली है? क्या स्वतन्त्र भारत में भी स्त्रियाँ परतंत्र बनी रहें? सच तो ये है कि वर्तमान समय में स्त्रियों के आत्मविश्वास और आत्मबल को हमारे समाज ने तोडा है, हमारा शिक्षित समाज आज भी स्त्रियों को सम्मान देने के सम्बन्ध में अशिक्षित ही रह गया है| ये कहते हुए और भी दुःख होता है कि स्त्री स्वयं भी इस स्तिथि के लिए दोषी हैं? वो अपनी ही संतान से लिंग के आधार पर शुरू से ही भेद-भाव करती आई हैं| बेटे और बेटी को एक जैसा संस्कार नहीं दे पाई| अधिकतर स्त्रियों ने बेटों को प्यार और आजादी ज्यादा दी उसी का परिणाम है आज के समाज में स्त्रियों के लिए असुरक्षित वातावरण|
हमेशा से यही माना गया है कि स्त्रियाँ शारीरिक रूप से पुरुषों से कमजोर हैं पर मेरा मन ये नहीं मानता जो स्त्री सृजन की शक्ति रखती है वो कमजोर कैसे हो सकती है ज्यादातर हादसे का शिकार होने की वजह उनका डर और दहशत से कमजोर पड़ जाना ही होता है| एक छोटा बच्चा भी अगर अपनी पूरी शक्ति लगाकर हाथ पैर मारता है या शरीर कड़ा कर लेता है [जब बच्चा किसी बात के लिए जिद करता है] तो किसी के लिए भी उसे काबू में करना बहुत मुश्किल होता है| जब अकेली लड़की और स्त्री के साथ अकेले दुष्कर्म करना आसान नहीं रहा तब धोखे से उनके साथ दुष्कर्म होने लगे किसी सॉफ्ट ड्रिंक में नशे की गोली डालकर या फिर एक साथ कई दरिन्दे मिल कर दुराचार को अंजाम देने लगे| आज सबसे जरुरी है कि हमारा समाज अपनी सोंच को बदले जहाँ कानून सिर्फ पन्नों में धरे रह जाते हैं या तो समय पर साथ नहीं देते, उचित न्याय नहीं देते या समय पर न्याय नहीं देते तो हम अपने आप का भरोसा करें स्वयं न्याय करें| अगर स्वयं के घर में भी अपराधी या दुराचारी है तो उसे बचाएं या छुपायें नहीं बल्कि कानून के हवाले करें| अपने पास-पड़ोस और समाज में किसी को भी न्याय की जरुरत हो अन्याय के विरुद्ध खड़े हो न्याय का साथ दें| अपराधी को पनाह नहीं मिलेगी, उसे सजा मिलेगी तभी अपराधियों के मन में दहशत पैदा होगी| सजा भी सरेआम दिया जाये जिससे कोई भी जुर्म करने की जुर्रत न करे| अपने घर के बेटे और बेटियों को सही शिक्षा और संस्कार दें विशेष तौर पर बेटों को स्त्रियों का सम्मान करना सिखाएं उन्हें कभी भी ऐसी कोई शिक्षा न दे कि वह बेटा है तो जैसे चाहे जी सकता है| बेटा और बेटी दोनों को स्वतंत्रता और स्वछंदता का अंतर अच्छी तरह समझाएं| उन्हें प्यार दें पर अनुशासन में भी रखें रिश्तों की गरिमा के साथ ही उनसे ऐसा सबंध रखें कि वो अपनी हर छोटी-बड़ी बात साझा करे| उचित शिक्षा, प्यार और विश्वास की कमी ही किसी को गलत राह पर ले जाती है|
बेशक कानूनी दृष्टि से स्त्रियों को पूर्ण समानता मिल चुकी है लेकिन सिद्धांत और वास्तविकता में अभी भी बहुत अंतर है| भारत के ग्रामीण स्त्रियों की स्थिति अभी भी अच्छी नहीं कही जा सकती और वहीँ शहरों में की कुछ स्त्रियाँ स्वतंत्रता के नाम पर स्वछंद हो गई हैं| सफलता का मार्ग अपने देश की सभ्यता और संस्कृति की भेंट चढ़ा कर या पश्चमी सभ्यता का अन्धानुकरण करके पाना किसी के भी हित में नहीं न उनके स्वयं के और न आम स्त्रियों के बल्कि ऐसा करके वो आम स्त्रियों की स्थिति को बदतर बना रहीं हैं| अपने देश की मार्यादाओं को ध्यान में रखकर प्रगतिशील होना ही हितकर है|
समाजशास्त्री अफलातून ने कहा है कि- “समाज में नारी का स्थान व महत्व क्या है वही जो पुरुष का है न कम और न अधिक| स्त्री और पुरुष दोनों एक रथ के पहियों के सामान हैं यदि एक कमजोर या घटिया हुआ तो समाज का रथ निर्विकार रूप से आगे नहीं बढ़ सकता है| ये दोनों नभ में उड़ने वाले पक्षी के दो डैनों के समान हैं यदि एक डैना छोटा या अशक्त रहा तो पक्षी नभ में विचरण नहीं कर सकता|”
- सुधा जयसवाल

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
November 27, 2014

सुन्दर विचारपूर्ण पोस्ट सुधा

    sudhajaiswal के द्वारा
    November 27, 2014

    सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद निशा जी

yamunapathak के द्वारा
November 24, 2014

सुधा जी इतिहास से लेकर वर्त्तमान तक आपने स्त्रियों की स्थिति को प्रस्तुत किया है यह बहुत ही पठनीय ब्लॉग है साभार

    sudhajaiswal के द्वारा
    November 24, 2014

    आदरणीया यमुना जी, उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद!

jlsingh के द्वारा
November 20, 2014

समाजशास्त्री अफलातून ने कहा है कि- “समाज में नारी का स्थान व महत्व क्या है वही जो पुरुष का है न कम और न अधिक| स्त्री और पुरुष दोनों एक रथ के पहियों के सामान हैं यदि एक कमजोर या घटिया हुआ तो समाज का रथ निर्विकार रूप से आगे नहीं बढ़ सकता है| ये दोनों नभ में उड़ने वाले पक्षी के दो डैनों के समान हैं यदि एक डैना छोटा या अशक्त रहा तो पक्षी नभ में विचरण नहीं कर सकता|” यही सही भी है, आदरणीया सुधा जी…

    sudhajaiswal के द्वारा
    November 20, 2014

    आदरणीय जवाहर जी, प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद|

    yamunapathak के द्वारा
    November 24, 2014

    जवाहर जी की बातों से सर्वथा सहमत हूँ

    sudhajaiswal के द्वारा
    November 24, 2014

    यमुना जी, सहमति के लिए हार्दिक धयवाद!


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