Indradhanush

भरे खुशियों के रंग जीवन में!

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छुपे हो तुम कहाँ

Posted On: 15 Dec, 2014 Others में

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हे! मेरे ईश
छुपे हो तुम कहाँ
ढूंढें अँखियाँ

जानती हूँ मैं
हो मेरे अंतस में
बेकल हूँ क्यूँ

स्वयं से बात
नहीं हुई कब से
कारण यही

रहना तुम
यूँ ही सदा मुझमे
स्व बनकर

चंचल नदी
है अभी मेरा मन
सागर है तू

ज्ञान सागर
तुझमे मिलकर
हो जाऊं पार

भवसागर
माया के संसार से
दिला दो मुक्ति
- सुधा जयसवाल

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sonam Saini के द्वारा
December 15, 2014

नमस्कार दी ….बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने ….. चंचल नदी है अभी मेरा मन सागर है तू… (y) …ये तीन लाइन सबसे ज्यादा अच्छी लगी …..

    sudhajaiswal के द्वारा
    December 18, 2014

    सोनम, तुम्हारी प्रतिक्रिया पाकर बेहद ख़ुशी हुई….रचना की सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद!


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