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नैतिक मूल्य, धर्म और हमारा समाज

Posted On: 8 May, 2015 Others,social issues में

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समाज और व्यक्ति एक दूसरे के पूरक होते हैं, एक के बिना हम दूसरे के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकते| मैकाइवर तथा पेज के अनुसार- “व्यक्ति तथा समाज का सम्बन्ध एक तरफ का सम्बन्ध नहीं है इनमें से किसी एक को समझने के लिए दोनों ही आवश्यक हैं|”

अरस्तू के अनुसार- “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इस बात का सरल अर्थ ये है कि मनुष्य अपने अस्तित्व और विकास के लिए समाज पर जितना निर्भर है उतना और कोई प्राणी नहीं| मनुष्य में हम जो भी कुछ सामाजिक गुण देखते हैं वह समाज की ही देन है|”

एक व्यक्ति की प्राथमिक पाठशाला उसका अपना परिवार होता है और परिवार समाज का एक अंग है जहाँ हमें सबसे पहले शिक्षा मिलती है| परिवार और समाज के अनुरूप ही एक व्यक्ति में सामाजिक गुणों तथा विशेषताओं का विकास होता है| आज हमारे समाज का स्वरूप तेजी से परिवर्तित हो रहा है, ये भी सही है कि परिवर्तन इस संसार का नियम है लेकिन जिस तरह से हमारे समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है, वो सही नहीं है|

प्राचीन काल में पाठशालाओं में धार्मिक और नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग थे| अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा नीति को धार्मिक तथा नैतिक शिक्षा से बिलकुल अलग रखा, उन्होंने राज्य द्वारा संचालित विद्यालयों में इस शिक्षा को पूर्ण रूप से बंद करके धार्मिक तटस्थता की नीति का अनुसरण किया| स्वतन्त्र भारत में भी देश को धर्म निरपेक्ष घोषित कर कहा गया कि राज्यकोष से चलाई जाने वाली किसी भी संस्था में किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी| हरबर्ट के अनुसार- “नैतिक शिक्षा, शिक्षा से पृथक नहीं है जहाँ तक नैतिकता धर्म का अर्थ है इन दोनों का अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है| इस बात को इस प्रकार कहा जा सकता है कि धर्म के बिना नैतिकता का और नैतिकता के बिना धर्म का अस्तित्व नहीं है|”

किसी भी व्यक्ति में नैतिक मूल्यों का होना ही धर्म है, नैतिक मूल्यों के अनुरूप आचरण ही उसे चरित्रवान बनाता है| दूसरे शब्दों में नैतिक मूल्यों का पालन ही सदाचार है| सदाचार व्यक्ति को देवत्व की ओर ले जाता है और दुराचार से पशु बना देता है| राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध एवं विवेकानंद साक्षात ईश्वर इसलिए माने जाते हैं क्योंकि इनके कर्म नैतिक मूल्यों के अनुरूप थे| उनमें चरित्र-बल था, सच्चरित्रता थी| नैतिक मूल्यों- सत्यप्रियता, त्याग, उदारता, विनम्रता, करुणा, ह्रदय की सरलता और अभिमान हीनता के बारे में सभी को पता है पर इन मूल्यों के अनुरूप आचरण करने वाले या ये कहें कि अपने जीवन में इसे उतारने वाले व्यक्तियों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है| इसका मुख्य कारण जो मुझे समझ में आ रहा है वो ये है कि आज का व्यक्ति समाज की अनदेखी कर रहा है, वो स्वयं को महत्व ज्यादा दे रहा है और समाज को कम| समाज भी व्यक्ति के सही-गलत आचरण के प्रति तटस्थ रवैया अपना रहा है|

आज का व्यक्ति अहंकारी होता जा रहा है उसका चंचल मन जो कहता है उसी के अनुरूप आचरण करना उसे सही लगने लगा है| नैतिक मूल्यों के मूल में परहित [दूसरों का भला करना] का भाव आवश्यक है, तुलसीदास जी ने भी कहा है- “परहित सरिस धर्म नहीं भाई”| हमारे आधुनिक समाज में इस भाव की तेजी से कमी होती जा रही है| सदाचार की जगह औपचारिकता लेती जा रही है| हर व्यक्ति भौतिक सुख-संसाधनों से सच्चा सुख पाना चाहता है जिसके लिए सही या गलत तरीके से ज्यादा-से-ज्यादा रूपये कमाना चाहता है| अपना जो समय उसे घर-परिवार और समाज को देना चाहिए वो रूपयों के पीछे भागने में गवां देता है| सोशल मीडिया के हमारे जीवन में दखल ने दूर के लोगों को तो पास ला दिया है पर परिवार और समाज से दूर कर दिया है| अधिकांश लोगों का कीमती समय यहाँ व्यतीत होता है| मैं सोशल मीडिया के महत्व को नकार नहीं रही बल्कि उपयोग और दुरूपयोग के बारे में कहना चाह रही हूँ| सोशल मीडिया से जरुर जुड़े रहें पर परिवार और समाज को भी समय दें क्योंकि सच्चाई ये है कि भौतिक सुख-संसाधनों से सच्चा सुख पाना संभव नहीं, मन की शांति इनसे नहीं मिल सकती| मन की शांति के लिए धर्म के रास्ते पर चलना होगा और सदाचार से ही ये संभव है| आज व्यक्ति की मानसिकता में परिवर्तन सही दिशा की तरफ कम और गलत दिशा की तरफ ज्यादा हो रहा है| इसी का परिणाम है कि हमारे समाज का स्वरूप तेजी से परिवर्तित हो रहा है| चोरी, डकैती, खून-खराबा, बलात्कार, छेड़खानी, शोषण और अत्याचार की दुर्घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं| जब समाज का स्वरूप ही परिवर्तित होता जा रहा है तो एक व्यक्ति का सही समाजीकरण कैसे संभव हो सकता है| मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने व्यक्ति के समाजीकारण के बारे में कहा है कि व्यक्ति के व्यवहार का अधिकांश भाग अनदेखा व अचेतन शक्तियों द्वारा संचालित होता है| फ्रायड ने ‘स्वयं’ का Id अहं को Ego पराअहं को Super Ego पराअंह नामक तीन भागों में बांटा है| Id अर्थात मैं मानव की मूल प्रवृतियों, प्रेरणाओं, असामाजीकृत इच्छाओं एवं स्वार्थों का योग है| Id के सामने नैतिक-अनैतिक, अच्छे-बुरे का कोई प्रश्न नहीं होता है| अहं स्वयं का चेतन एवं तार्किक पक्ष है जो व्यक्ति को सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल व्यवहार करने का निर्देश देता है और Id पर नियन्त्रण करता है| Super Ego सामाजिक मूल्यों एवं आदर्शों का सहयोग है जिसे व्यक्ति ने आत्मसात कर रखा है जो उसकी अंतरात्मा का निर्माण करता है| एक उदहारण से उन्होंने Id मैं [अहं] एवं पराअहं की अवधारणा को स्पष्ट किया है| मान लीजिये एक व्यक्ति बहुत भूखा है उसे मिठाई खाने की इच्छा है पर भूख Id कहलाती है Ego कहेगा कि मिठाई खाना है भूख शांत करना है तो मेहनत करो, पैसा कमाओ अगर परिस्थितियां अनुकूल हो तो चोरी कर लो, चुपके से उठाकर खा लो| इस प्रकार Ego, Id से सामाजिक परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं किन्तु Super Ego व्यक्ति को कहेगा कि चोरी करना पाप है, अनैतिक है, सामाजिक मूल्यों के विपरीत है| फ्रायड के अनुसार Id या Super Ego  के पारस्परिक संघर्ष की प्रक्रिया में व्यक्ति का समाजीकरण होता है|

हर इन्सान के भीतर सही-गलत का निर्णय करने के लिए अंतरात्मा है जिसकी आवाज हमें सही और गलत का अंतर बताती है| ये बताती है कि कौन सा कार्य सही है और कौन गलत, हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए| अगर हम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुरूप आचरण करें तो नैतिक मूल्यों की उपेक्षा कभी नहीं करेंगे|

व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का मुख्य उत्तरदायित्व परिवार और विद्यालय पर होता है और ये उत्तरदायित्व तभी पूरा किया जा सकता है जब वह उसे धार्मिक और नैतिक शिक्षा प्रदान करे| शिक्षा आयोग के शब्दों में विद्यालय पाठ्यक्रम का एक गंभीर दोष यह है कि सामाजिक, नैतिक और अध्यात्मिक मूल की अव्यवस्था और शिक्षा की अनुपस्थिति|

यदि हम अपनी सभ्यता और संस्कृति को सुरक्षित और विकसित करना चाहते हैं तो प्रत्येक शिक्षा संस्थान में धार्मिक और नैतिक शिक्षा का उपयुक्त आयोजन किया जाना आवश्यक है| विद्यालय पाठ्यक्रम में धार्मिक व नैतिक शिक्षा को उचित स्थान मिलना चाहिए, अन्य विषयों जितना महत्व भी मिलना चाहिए क्योंकि एक व्यक्ति अपने जीवन दर्शन, प्रेरणा और नैतिकता से आत्मिक बल प्राप्त करता है| सत्य, विनय, करुणा, क्षमा, स्नेह, सहनुभूति, आत्म-निर्भरता, निर्भीकता, वीरता, आत्म-त्याग ये सारे नैतिक मूल्य एक व्यक्ति को चरित्रवान बनाते हैं| सद्गुणों को अपना कर ही हमें सच्चा सुख, संतोष और आनंद प्राप्त हो सकता है| आज हमारा समाज नैतिक पतन की ओर अग्रसर हो रहा है| यदि हर व्यक्ति सदाचार के महत्व को समझे और चरित्र-बल का विकास करे तो छल-कपट, पाखंड, व्यभिचार, षड्यंत्र और संघर्षों से हमारा समाज मुक्त हो सकता है| मेरे विचार से हर व्यक्ति सबसे पहले स्वयं को समय दे, चिंतन-मनन करे और आत्मविश्लेषण करे| अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना ना करे| परिवार, मित्रों, रिश्तेदारों और समाज के लिए भी समय निकाले, विशेषतः बच्चे जो कल देश का भविष्य बनेंगे उन्हें धर्म और नैतिक मूल्यों का महत्व समझाएं| एक-एक अच्छे व्यक्ति से एक अच्छा परिवार बनेगा, एक-एक अच्छे परिवार से एक अच्छा समाज और एक अच्छा समाज सुसंस्कृत देश की पहचान बनेगा|

- सुधा जयसवाल

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