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भरे खुशियों के रंग जीवन में!

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शीशे सा रिश्ता

Posted On: 11 Jun, 2015 Others,social issues में

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लोग पत्थर के हैं यहाँ और,

रिश्ता शीशे सा जोड़ते हैं|

फूलों की तमन्ना में दामन में,

सिर्फ काँटे हीं आते हैं|

लाखों सितारों से रौशन है ये जहां मगर,

शमा की आँखों से तो अश्क ही लरजते हैं|

खुशियों में थी जिनकी इनायते-नजर हम पर,

गमे-दौर में वही नजरें फेर लेते हैं|

जिनके लिए रखी हमेशा अपनी आँखों में पानी हमने,

उन्हीं की आँखों में हमारे लिए पानी नहीं है|

जिस जुबां से झड़ते थे फूल,

वो जहर बुझे नश्तर चुभोने लगे हैं|

छोड़ दिया अपने जख्मों को वक़्त के भरोसे,

मगर वो तो भरने के बजाय नासूर बन गए हैं|

कोई भी नहीं ऐसा जो दूर तलक साथ दे,

लोग सारे खुदगर्ज हो गए हैं|

रिश्ते-नाते, दोस्ती, वफ़ा की बातें,

तो बस किस्से-कहानियों के हिस्से रह गए हैं|

लोग पत्थर के हैं यहां और,

रिश्ता शीशे सा जोड़ते हैं|

- सुधा जयसवाल

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
June 14, 2015

सुधा जी बहुत सुन्दर लिखा है आज के समाज का बहुत बड़ा सच है यह . साभार

ravindersingh के द्वारा
June 14, 2015

आदरणीया सुधा जी, सादर सुंदर सोच…. लाखों सितारों से रौशन है ये जहां मगर, शमा की आँखों से तो अश्क ही लरजते हैं|

Shobha के द्वारा
June 14, 2015

प्रिय सुधा जी “लोग पत्थर के हैं यहाँ और, रिश्ता शीशे सा जोड़ते हैं ‘ अति सुंदर सोच पुरु कविता आपके भावुक व्यक्तित्व को दर्शाती है शोभा

Dr. D K Pandey के द्वारा
June 13, 2015

बेस्ट.

ashasahay के द्वारा
June 13, 2015

सुन्दर कृति। आशा सहाय ।

Maharathi के द्वारा
June 12, 2015

शानदार कृति और सुन्दर शब्द चयन।। महारथी।।

jlsingh के द्वारा
June 12, 2015

आदरणीया सुधा जी, सादर अभिवादन! इतना निराश भी मत होइए – सोना सज्जन साधु जन, टूटै जुड़े सौ बार दुर्जन कुम्भ कुम्हार के एकै धका दरार! होना तो यह चाहिए लोग भले शीशे के हों पर रिश्ते पत्थर की तरह मजबूत हो. वैसे रिश्ते बहुत जल्द ख़त्म नहीं हो जाते टूटने का अहसास जरूर होता है. खासकर वैसे रिश्ते जिनसे ज्यादा लगाव होता है.


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