Indradhanush

भरे खुशियों के रंग जीवन में!

52 Posts

177 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 11793 postid : 1264577

नवरात्र पूजा एवं ध्यान

Posted On: 30 Sep, 2016 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

नव का अर्थ है नया और रात्र का अर्थ है अनुष्ठान, नवरात्र अर्थात नया अनुष्ठान। मार्कण्डेय पुराण में देवी का जो महात्म्य दुर्गा सप्तशती के द्वारा प्रकट किया गया है, उसमें लिखा है कि मधु-कैटभ, शुम्भ-निशुम्भ और महिसासुरादि तामसिक वृत्ति वाले असुरों के जन्म से देवता दुःखी हो गए और सबने मिलकर महामाया की स्तुति की। देवी ने वरदान दिया- ‘डरो मत, मैं शीघ्र ही प्रकट होकर इन असुरों का संहार करुँगी। तुम लोगों को आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से घट स्थापना कर नवमी तक, नौ दिन पूजा करनी होगी।’ इसी पौराणिक मान्यता के आधार पर नवरात्र उत्सव अनादि काल से आज तक चला आ रहा है। नवरात्र ऋतु परिवर्तन का समय होता है, शरद नवरात्र नई फसल के आगमन के रूप में महालक्ष्मी का प्रत्यक्ष स्वरूप दर्शन सूचक भी है। इस समय त्रिगुणात्मक शक्ति सम्पूर्ण जगत का परिवर्तन करती है, इसलिए यह समय शक्तिस्वरूप दस महाविद्याओं की आराधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
नवरात्र में हम सभी व्रत नियम-निष्ठा से करते हैं। कहा जाता है कि कर्म ही पूजा है पर कर्म के तो दो प्रकार हैं- अच्छे कर्म और बुरे कर्म, हमें ये मानना चाहिए कि सत्कर्म ही पूजा है।
अगर एक गृहिणी पूरे नियम-निष्ठा से 2-3 घंटे ध्यान और पूजा में तल्लीन रहे और घर में बीमार माता-पिता और बच्चे भूखे रहें, उन्हें समय पर भोजन न मिले तो ऐसी पूजा का कोई फायदा नहीं और न ही ईश्वर प्रसन्न होंगे। मेरे कहने का अर्थ ये नहीं कि आप 2-3 घंटे विधिवत पूजा ना करें, जरुर कर्रें पर सही समय-प्रबंधन के साथ। 4 बजे सुबह उठकर पूजा कर लें, ब्रह्म मुर्हुत में की गई पूजा श्रेष्ठ भी मानी जाती है। ईश्वर नहीं चाहते कि अपने कर्तव्यों को पीछे रखकर उनका ध्यान किया जाए। ईश्वर के आगे हमने मेवे मिष्ठान के भोग लगाये और घर पर आये गरीब को भूखे ही लौटा दिया तो ईश्वर आपके मेवे मिष्ठान को स्वीकार नहीं करेंगे। जरुरतमंदों की यथाशक्ति मदद जरुर करें।
हम अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाएँ, सच्चा धर्म यही है, अगर किसी के लिए मन में बुरे भाव रखें और किसी का बुरा चाहें और मुख से मंत्रोचारण करें तो वो सिर्फ खोखले शब्द होंगे। वेदों के सिर्फ शब्द पढ़ना ही काफी नहीं क्योंकि सिर्फ शब्द मनुष्य और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बीच संचार का माध्यम नहीं बन सकते। हमें नकारात्मक भावों जैसे- घृणा, ईर्ष्या, लालच, प्रतिशोध, डर, क्रोध और अन्धविश्वास के नकारात्मक भाव से बचना होगा।
सकारात्मक भावों जैसे- आस्था, दृढ इच्छा शक्ति, प्रेम, उत्साह और आशा को प्रबल करना होगा। मनुष्य के मन में स्वाभाविक रूप से नकारात्मक भाव पहले आते हैं ये हमारी दृढ इच्छा शक्ति है और हम पर निर्भर है कि हम किस भाव को प्रबल होने देते हैं। एक ही समय में नकारात्मक और सकारात्मक भाव मन में नहीं रह सकते, कोई एक ही प्रबल होगा। एकाग्रचित्त होकर सकारात्मक भाव से पूरे मनोयोग से ईश्वरीय शक्ति का ध्यान ही भावातीत ध्यान है। भावातीत ध्यान आत्मा और परमात्मा के बीच संचार का माध्यम है। ध्यान में हमारा मष्तिष्क एकाग्र होकर सूक्ष्म स्तर पर कार्य करने लगता है और हमारे भावों का सम्प्रेषण परमात्मा तक ध्वनि तरंगों से भी तीव्र गति से पहुँचती है। वैदिक शास्त्रों और श्रीमद्भगवद्गीता में भी भावातीत ध्यान का वर्णन है, इसमें कहा गया है कि इससे हमारी मानसिक दुर्बलता दूर होती है, बुद्धि तीक्ष्ण होती है, समझदारी गहरी होती है और स्मरणशक्ति बढती है। साथ ही ये हमारी मानसिक शक्ति को बढ़ा कर हमें ऊर्जावान बनाती है।
इस नवरात्र से प्रयास करें उपरोक्त बातों के अनुरूप एकाग्रचित्त होकर, हम माँ दुर्गा का आह्वान करें। पूरे नौ दिन विधिवत माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना करें। नवरात्र में दुर्गा सप्तशती के पाठ का विशेष महत्व है, ऐसी मान्यता है कि इस पाठ से नौ ग्रहों के बुरे प्रभाव से मुक्ति मिलती है। माँ की आरती पूरे परिवार के साथ करें, वेदशास्त्र के अनुसार सामूहिक गान का व्यापक महत्व है। प्राचीन काल में तीर्थयात्राओं,देवदर्शनों एवं मेलों में गाते हुए जाने की प्रथा थी। पर्व त्यौहारों पर संगीत एवं भजनों के सामूहिक कार्यक्रम होते थे, जिसके प्रभाव से खेत अच्छी फसल और वृक्ष मीठे फल देते थे। इसके पीछे वैज्ञानिक तथ्य है कि संगीत की स्वर-लहरियों से दूषित तत्व नष्ट होते हैं। आज भी कार्यक्रम होते हैं पर स्वरूप बदल गया है। पुरानी परम्पराओं को फिर से महत्ता देने की शुरुआत हम अपने घर से करें और सकारात्मक वातावरण बनायें। नवरात्र के दिनों में शक्ति- वंदना, दुर्गा माँ की वीरता और बुद्धिमत्ता के प्रसंग हमें सकारात्मक ऊर्जा से भर देते हैं। हमें प्रेरित करते हैं कि हम सत्य के लिए संघर्ष करें और सत्य की शक्ति पर भरोसा रखें। माँ की विजयगाथा हमें आत्मशक्ति देती है कि हम सात्विक भाव के शुभ प्रभावों से समाज के असहाय वर्ग के लिए सोंचें। लंगर, प्याऊ, दान, भंडारा आदि के माध्यम से समाज का कल्याण करें। समाज से जुड़ें और अपने जीवन में संतुष्टि, सुख, और समृद्धि लायें।
- सुधा जयसवाल

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
September 30, 2016

जय श्री राम सुधाजी नवरात्रों पर बहुत सुन्दर लेख जिसमे बहुत नई चीजे पढने को मिली वैसे हिन्दू लोग २ बार नवरात्रि मनाई  जाती लेकिन शारदीय नवरात्रों की ज्यादा धूम धाम से मनाया जाता है इसके अलावा २ गुप्ता नवरात्रे भी होती असर में ये बदलते मौसम में मानसिक योगिक क्रियाओ को विकसित करने के लिए है.पूजा असर में रात को ही करनी चाइये लेकिन होता नहीं क्योंकि रात को दवानी की गति तेज होती है इसीलिये रात में बजाये मंदिरों के घंटे शंख की दवानी बहुत दूर तक जाती है.सुन्दर लेख के लिए आभार.


topic of the week



latest from jagran